गजल

उन शाखोँ पर फिर से पत्ते नहीँ आये
जो काट डाली थी तूने अपने हाथ से
वह क्यारियाँ तरसीँ फिर हरी पौध को
जहाँ फूल जल गये थे भरी बरसात मेँ
यह बात मेरी समझ मेँ कभी नहीँ आई
है जिन्दगी से शिकवा, या मेरी बात से
जाने तलाश किस मँजिल की रही तुझे
खूबसूरत मरहले गुजरे यूँ आसपास से
दिल से तूने  कभी अपना नहीँ समझा
औरोँ के लिये रहे  तेरे खासमखास से